सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कोरोना वायरस और भारत


पूरी दुनिया और भारत ने अब तक के इतिहास में कई बार महामारियों का सामना किया है। जिसमें प्लेग, हैजा, चेचक और फ्लू से लेकर कोविड-19(कोरोना) तक ये महामारियां हर कुछ दशक बाद आई हैं। साथ ही, इन्होंने एक बड़े जनसमूह को बुरी तरह परेशान किया है। इस समय कोविड-19 ने विश्व भर के देशों को जमीन पर घुटने टेकने को मजबूर कर दिया है। चीन के वुहान नामक शहर से फैला यह वायरस इटली, अमरीका, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन, फ्रांस समेत दुनिया भर में पसर गया है।
तस्वीर: गौरव तिवारी


कोरोना वायरस से लड़ने के लिए अभी तक कोई वैक्सीन तैयार नहीं हो पायी है। ऐसे में इससे बचाव के लिये दो बड़े उपाय उभरकर सामने आये हैं। ज्यादातर देश इन्हें अपना भी रहे हैं। कुछ देशों ने ज्यादा से ज्यादा लोगों की जाँच करवाकर इस पर काबू पाया है। तो वहीं, कुछ देशों ने लंबे लॉकडाउन के बाद इस पर काबू पाया है।

भारत में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रायल के तौर पर 22 मार्च को लॉकडाउन की घोषणा की। साथ ही, उसी शाम को सबसे अपने दरवाजे और बालकनी पर खड़े होकर थाली और घण्टे आदि बजाने को कहा। उन्होंने कहा, यह सब इस संकट की घड़ी में योद्धा बनकर सामने आए डॉक्टर्स और नर्सेज को धन्यवाद अर्पित करने का एक तरीका है। इसमें देखा गया कि लोग उत्साह के मारे घरों से बाहर निकलकर गलियों में एकसाथ जमा होकर थालियां पीट रहे थे। कुछ लोगों को तो म्यूजिक सिस्टम लगाकर एकसाथ नाचते भी पाया गया। कुछ लोगों ने अति उत्साह में पटाखे तक जलाये।

इस बीच अफवाहों का बाजार भी गर्म हो चुका था। लोगों के सुधीजनों द्वारा उन्हें फोनकॉल पर सलाह मिलनी शुरू हो गयीं। इनमें सबसे तेजी से फैली अफवाहें निम्न थीं।
1. आपके जितने पुत्र हैं। उतने दीपक जलाने से कोरोना वायरस के खतरे समाप्त हो जाते हैं।
2. आप अपनी रामचरित मानस के पन्नों के बीच में पड़े बाल तलाशिये। फिर इन्हें गंगाजल में घोलकर पी लेने से कोरोना वायरस के खतरे खत्म हो जाते हैं।
3. आपके जितने पुत्र हैं। उतने बाल्टी पानी किसी कुएँ में डालने से कोरोना वायरस के खतरे समाप्त हो जाते हैं।
4. कई जगह अफवाह उड़ी कि बिस्तर में सोते रहने से आप पत्थर के हो जायेंगे। ऐसे में लोग डर के मारे एकसाथ बाहर जमा पाये गये।
पुलिस प्रशासन ने इससे पार पाने के लिए मामले की जानकारी लेकर शिकायत भी दर्ज की। कई लोगों पर कार्रवाई हुई।

दो दिन बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च रात 8 बजे टीवी समाचारों के ज़रिए रात 12 बजे से 14 अप्रैल तक लॉकडाउन की घोषणा की। उन्होंने लोगों से अपील भी की कि अफवाहों से दूर रहें। इसके बाद से देश भर के हर राज्य, जिले और गाँव से लेकर गली-मोहल्ले तक सब बदल गया। ज्यादातर लोग अपनी समझदारी के हिसाब से सावधानी बरतने लगे।

इसके बाद से ही देश के सभी बड़े शहरों से मजदूरों के भारी संख्या में पलायन की खबरें सामने आने लगीं। लॉकडाउन के चलते सभी रेल यात्राएं और अंतर्राज्यीय बस यात्राएं बन्द थीं। ऐसे में कई मजदूरों ने अकेले और कुछ ने परिवार के साथ अपने घर के लिये पैदल चलना शुरू कर दिया। देखा गया कि कई मजदूर 2000 किलोमीटर लम्बी यात्रा में भी पैदल ही निकल चुके हैं। यह सब सरकार की ओर से उनके रहने और खाने के इंतजाम को लेकर विश्वास न पैदा हो पाने के कारण हुआ। मजदूरों ने सवाल उठाया कि विदेश में रह रहे लोगों के लिए सरकार ने उनके घर पहुंचाने के लिए हवाई जहाज का इतंजाम कर दिया। लेकिन, उनके लिये इंतजाम तो दूर खाने और पानी की जगह पुलिस के डंडे खाने पड़ रहे हैं। बाद में कई राज्य सरकारें हरकत में आयीं और उन्होंने मजदूरों को घर पहुँचाने के लिए बसें मुहैया करायीं।

इस बीच देखा गया कि सभी देशों के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति प्रेस कॉन्फ्रेंस और अन्य माध्यमों के जरिये लगातार लोगों से मुख़ातिब होते रहे। उन्हें देश की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं और आगे की रणनीति की लगातार जानकारी दे रहे थे।

लॉकडाउन के कई दिन बीत जाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि वे 3अप्रैल की सुबह 9 बजे वीडियो के जरिये लोगों को सम्बोधित करेंगे। सभी टीवी पर टकटकी लगाये बैठे थे। उन्हें उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री कोई नया राहत पैकेज लेकर सामने आयेंगे। स्वास्थ्य सुविधाओं में हुये नये इतन्जामों की जानकारी लेकर सामने आएंगे।
उन्होंने बोलना शुरू किया। पीएम इस बार भी लोगों से अपील कर रहे थे। उन्होंने 5 अप्रैल को रात 9 बजे से 9 मिनट तक दीये, मोमबत्ती और टॉर्च जलाने को कहा। उन्होंने कहा इससे एकजुटता का संदेश जाएगा। इससे हमें कोरोना वायरस से लड़ने में मदद मिलेगी।

उनकी अपील से लोगों में एकजुटता का संदेश भले न गया हो। लेकिन, दीपक जलाने को लेकर फैली अफवाह को बल जरूर मिल गया है। लोगों ने माना है कि वे दीपक जलाकर सही ही कर रहे थे। तभी पीएम ने भी उन्हें ऐसा करने को कहा है। कई लोगों ने अपने पीएम की बात को आगे बढ़ाया है। कुछ लोग 5 बत्तियों का तो कुछ 7 बत्तियों का दीपक तैयार कर रहे हैं। अपने सम्बन्धियों को फोनकॉल पर ऐसा करने की जानकारी भी दे रहे हैं।।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

'शेखर : एक जीवनी' एक उपन्यास भर नहीं पूरा जीवन है।

अज्ञेय ने तमाम ऐसे संवादों को अधूरा छोड़ दिया है, जहाँ भावना बहुत तीव्र हो चली है। लेखक का संवाद में पैदा किया गया यह निर्वात उसे और भी खूबसूरत बना देता है। 'शेखर : एक जीवनी' - दूसरा भाग आप इसे पढ़ते-पढ़ते स्वयं शेखर हो जाते हैं। इसमें पिरोयी गयी अनुभूतियाँ इतनी तीव्र हैं कि सबकुछ आपके सामने घटित होने लगता है। शेखर एक पल के लिए भी रचा गया पात्र नहीं लगता है। लगता ही नहीं कि वह कभी किसी लेखक के हाथ की कठपुतली रहा होगा। उसे मनमाने ढंग से मोड़ और ढाल दिया गया होगा। शेखर तभी तक पन्नों में सिमटा रहता है, जब तक उसे पढ़ा नहीं गया। पढ़ते ही वह जीवंत हो जाता है। लौट आता है और और शशि की सप्तपर्णी छाया में बड़ी सहजता से आदर्श के नये-नये कीर्तिमान रचता चला जाता है। एक बार पढ़ लेने के बाद उसे पुनः पन्नों में समेटना और सहेजना असम्भव बन पड़ता है। अज्ञेय के संकेत शेखर को इस समाज के विरोध में सहजता से खड़े होने के लिए बल देने के झूठे प्रयास से लगते हैं। जिसकी उसे कोई आवश्यकता नहीं दिखती है। शेखर कभी बनता हुआ पात्र नहीं जान पड़ता है। वह एक ऐसा पात्र है, जो पहले से ही बना हुआ है। वह उलट परिस्थिति...

रबी में 'अंध' तो खरीफ में 'कुप्प'

रबी फसल की बेहद कम मात्रा और सस्ते दाम पर हुई बिक्री ने अंधेरा पैदा किया है। तो वहीं खरीफ की फसल को लेकर स्थिति साफ न होना उसमें कुप्प भी जोड़ रहा है। दोनों ने मिलकर किसानों के लिए 'अंधाकुप्प' जैसी स्थिति बना दी है। गेहूँ की मड़ाई करते मजदूर किसानों ने खरीफ़ की फसल के लिये खेतों की जुताई शुरू कर दी है। जबकि अभी रबी की करीब 30 फीसदी फसल खेत में ही सड़ने को छोड़ दी गयी है। वेजिटेबल्स ग्रोअर्स एशोसिएशन ऑफ इंडिया(वीजीआई) का दावा है कि किसानों ने करीब 30% सब्जी खेतों में ही सड़ने को छोड़ दी है। इस बीच फलों की बिक्री में भी भारी गिरावट दर्ज की गयी है। जिससे तमाम बागान मालिकों की भी चिंता की लकीरें गाढ़ी हो गयी हैं। इसके प्रमुख कारण लॉकडाउन के चलते होटल, रेस्टोरेंट और ढाबों का बन्द होना और शहरों के लिए सब्जी और फलों का सप्लाई सिस्टम का ठप्प हो जाना। सरकार ने इसे सुलझाने के लिए अब तक कोई रास्ता नहीं निकाला है। इससे किसानों को भारी घाटा हुआ है। देश में सब्जियों और फलों की उपलब्धता में करीब 65 फीसदी हिस्सा रबी फसल का ही होता है। बाकी योगदान खरीफ फसल का है। ऐसे में रबी की पूरी फस...

पानी

यह मेरे मोहल्ले की तस्वीर है। मुझे नहीं मालूम कि आप इस तस्वीर को कैसे देखते हैं! हो सकता है। यह आपके लिये एक नये तरह की तस्वीर हो। या फिर, आप ऐसी तस्वीरों के आदी हों। कुछ लोग इसे जीते भी होंगे। जो जी रहे हैं, उनके साथ मेरी संवेदना है। संवेदना इसलिये है कि मैं स्वार्थी हूँ। मुझे भी ऐसे ही पानी भरना होता है। मैं 200 मीटर दूर से रोज सुबह-शाम पानी भरी बाल्टियां ढोना पसंद नहीं करता हूँ। लेकिन, ढोनी होती हैं। क्योंकि मुझे भी पानी पीना है, नहाना है, खाना है, टॉयलेट जाना है। मैंने बचपन से देखा है कि पानी पीना सरल नहीं है। मेरे गाँव में पानी पीने के लिए मेहनत करनी होती है। शायद इसीलिए मुझे पानी से प्रेम है। मुझे अनुपम मिश्र से भी बहुत प्रेम है। इसीलिये राजस्थान और बुन्देलखण्ड के लोगों के साथ मेरी संवेदना है। मिडिल क्लास और अपर मिडिल क्लास के लोग इन मामलों में सबसे सबसे धूर्त होते हैं। उसे यह सब पढ़कर बहुत गुस्सा आता है। उसे लगता है कि कितने रोनू लोग हैं, 'घर में ही नल क्यों लगवा लेते'। उन्हें यह सब बहुत सरल लगता है। मैंने इन्हें पानी बहाते देखा है। ये मना करने पर और अधिक पानी बहाते...